कैलासराणा शिवचंद्रमौळी । फणींद्र माथां मुकुटीं झळाळी ॥ कारुण्यसिंधू भवदुःखहारी । तुजवीण शंभो मज कोण तारी ॥
सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजित |द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम|| कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे|त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे||
सच्ची है पुकार SS सच्ची है पुकार तो वो दादाजी तक जाएगी उनकी अनुकंपा लाएगी शरणागति की राह SS शरणागति की राह तेरा अहंकार पिघलाएंगी गुरु की करुणा उपजाएगी सच्ची है पुकार SS
विगत ५० वर्षो से दादाजी की सतत सेवा में निमग्न प्रकांड विचारक , युगद्रष्टा एवं एकनिष्ठ साधक श्री नरेंद्र दादा एलपुरे दादधाम के प्रणेता है । आप ही के मार्गदर्शन में दादधाम ने अपना वर्त्तमान स्वरुप प्राप्त किया है । आप मन वचन एवं कर्म से इतने दादामय हो गये की आपके अनुयायी आपको दादाजी ही कहने लगे ।
युवावस्था में ही अध्यात्म - मार्ग पर चल निकलने के बाद आपने सांसारिक जीवन तथा आध्यात्मिक साधना के बीच एक आदर्श संतुलित स्तापित किया । अपने सरकारी नौकरी साथ एक स्वावलंबी गृहस्थ का जीवन जिया । आपकी भार्या सौ कविता ताईे एलपुरे एक आदर्श सहधर्मिणी , सह - साधिका एवं वात्सल्य मूर्ति है । सभी स्त्री भक्तो की वे कुशल मार्गदर्शिता है ।
व्यक्तिगत रूप से हो या सामूहिक रूप से , दादाजी की नियमित उपासना में निम्नांकित जयकारो का समावेश आवश्यक है :
दादा - स्मरण हेतु निम्नांकित मंत्र निर्धारित है : १ ) दत्त गुरु ॐ , दादा गुरु ॐ २ ) भजो दादाजी का नाम , भजो हरिहरजी का नाम
प्रणेता अपने अनुयायिओं के जीवन में गीता - वर्णित ज्ञानमार्ग , कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग का सुंदर समन्वय सुगमता से घटित करा देते है ।
प्रणेता प्रदत्त ज्ञान
बुद्धि को चेतन बनाने का मार्ग है सत्संग । सज्जनो के साथ रहने पर ईश्वर तक पहुंचने वाले अनेक मार्गो का पता चलता है । लेकिन कलियुग में केवल एक मार्ग ही अनुकरणीय है : नाम स्मरण ।
प्रणेता प्रदत्त ज्ञान
भक्ति किसी फल- प्राप्ति की कामना से युक्त नहीं होनी चाहिए । अडिग भक्त , निस्वार्थ कर्म तथा अहंकार-रहित ज्ञान ही आध्यात्मिक विकास के सोपान है ।
प्रणेता प्रदत्त ज्ञान
अपने द्वारा प्रारंभ किये गये हर उपक्रम के आधार में किसी संत का आशीर्वाद होना चाहिए ।
प्रणेता प्रदत्त ज्ञान
गुरु ही ब्रह्मा बन कर आपके लिए सुनहरे भविष्य का सृजन करता है , वही गणेश बनकर आपका मार्ग निष्कंटक बनाता है, वही विष्णु बनकर आपके उपक्रम का पोषण करता है , और वही शिव बनकर सब-कुछ अपने में लीन कर लेता है ।
प्रणेता प्रदत्त ज्ञान
सद्गुरु श्री दादाजी धूनीवाले महाराज ही साक्षात् परमात्मा है । जो एक बार उनके पास जाता है , वह कभी खली हाथ नहीं लौटता ।
दादाजी महाराज भगवान शंकर के साक्षात अवतार थे । ई सन १८५० के लगभग आप अपने गुरु ब्रमहर्षि गौरीशंकर महाराज को नर्मदा के तट पर एक ८ वर्षीय बालक के रूप में मिले थे ।गुरु के मार्गदर्शन में प्रारंभिक प्रशिक्षण के बाद आपको ऊच शिक्षा हेतु कशी भेजा गया । यहां आप अल्पकाल में ही चारो वेदों , पुराणों , उपनिषदों इत्यादि में निष्णात हो गये । गुरु महाराज ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना दिया । दादाजी को आश्रम चलाने के काम नितांत सांसारिक प्रतीत होते । वे अक्सर बीहड़ वनों में जाकर गहन तपस्या करने लगते । प्रचंड साधना के कारण अष्ट - सिद्धियाँ स्वयमेव आपके हस्तगत हो गई । आश्रम का कार्य औरो को सौप कर आप ध्यान , तप , तीर्थाटन एवं लोक कल्याण के कार्यों में निमग्न हो गए ।
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