किशोर वर्मा

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संत का खजाना ! """"""""""""""""""""""""" 🛕

- किशोर वर्मा

एक संत थे। उनके आश्रम में सैकड़ों भक्त आते थे। सभी अपनी अपनी समस्याएं बताते। संत उनका निराकरण भी करते।

एक दिन संत ने घोषणा की :
'भक्तों, अब तक मुझे तुममें से प्रत्येक की समस्याएं पता लग चुकी हैं। मैं उन्हें हल करता रहा हूं। पर एक समस्या हल करता हूं तो अगले हफ्ते वही भक्त दूसरी समस्या लेकर आ जाता है। 

' मैंने फैसला किया है कि अब मैं एक आखरी बार कुछ भक्तों की समस्याएं हल कर के कष्ट -निवारण का यह सिलसिला हमेशा के लिए बंद कर दूंगा।'

भक्तजन स्तब्ध रह गए।

संत ने आगे कहा :
'आपकी कामना -पूर्ति के लिए मेरी कुछ शर्तें हैं।
पहली शर्त यह है कि मेरे पास कामना लेकर केवल वही जन आएं, जो मेरे सच्चे भक्त हैं।

दूसरी शर्त यह है कि भक्त अपनी वही कामना पूरी कराए, जो उसकी सबसे बड़ी और कठिन कामना हो।

तीसरी शर्त यह है कि निम्नलिखित ३ कामनाएं मैं पूरी नहीं करूंगा :
१. अमरत्व प्राप्ति, (अर्थात भक्त कभी न मरे। )
२. अजरत्व प्राप्ति, (अर्थात भक्त कभी बूढ़ा न हो। )
३. गैर -वाजिब  पद -लिप्सा  (अर्थात जिस पद को पाने की अपने पास योग्यता / पात्रता नहीं है, उस पद की प्राप्ति की कामना। जैसे प्रधान -मंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति, गवर्नर इत्यादि पदों की कामना।)

संत ने २१ दिनों तक आश्रम बन्द रखा। इस काल में उन्होंने   निर्जल रह कर किसी प्रभावशाली मंत्र का विधिवत जप किया।  २२ वें दिन उन्होंने सभी अभिलाषी भक्तों को बुलवाया।

लेकिन यह क्या ! संत ने केवल सच्चे भक्तों को बुलवाया था। लेकिन आ गए सभी लोग। खुद की नजर में कौन सच्चा नहीं है ? सभी भक्त अपने साथ अपनी अपनी कामनाओं की चिट्ठी लेकर आए थे।

संत जी ने सभी चिट्ठियां अपने पास रख लीं। सभी को वापस घर जाकर अपना अपना  गुरु -मंत्र जपने को कहा। ये भी बताया कि कामनाएं कल प्रातः से पूरी होना शुरू हो जाएंगी। सबसे आखिरी कामना ३० वें दिन पूरी होगी। ३१ वे दिन सभी भक्त आश्रम में फिर जमा हों ताकि सभी का मुंह मीठा कराया जाए।
भक्तजन राजी - खुशी घर लौट गए।
अगले दिन तो मानों जन -सैलाब ही उमड़ आया। भक्तजन खुशी खुशी आकर अपने को प्राप्त फल का बखान करने लगे।
३० दिन तक यही सिलसिला चलता रहा। किसी की शादी तय हो गई। किसी के घर पुत्र ने जन्म लिया। किसी की रूठी हुई पत्नी मायके से वापस आ गई। किसी की बहू शादी के ८ साल बाद गर्भवती हो गई। किसी को नौकरी लग गई। कोई कोर्ट -केस जीत गया। किसी को एक लाख की लॉटरी लग गई। किसी के पति ने दारू छोड़ दी। किसी का गुमा हुआ धन मिल गया। किसी का तगड़ा लोन बैंक से मंज़ूर हो गया। किसी का कर्ज माफ हो गया।

अन्तिम दिन एक नेताजी को चुनाव की टिकट मिल गई। एक फैक्टरी वाले को १० करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिल गया। एक सेठानी जी की कैंसर की रिपोर्ट नॉर्मल आ गई। एक उद्योगपति के बेटे को अपनी नई BMW कार के लिए मनवांछित नंबर RTO से मिल गया। 
सभी खुश थे। सभी के मनोरथ पूरे हो गए थे। सभी जन संत जी का अभिवादन कर लौटने लगे। संत जी ने अगले दिन रुद्राभिषेक का कार्यक्रम रखा, जिसमें सभी को आना था।

अगले दिन आश्रम में गजब का सन्नाटा रहा। नियमित कार्यकर्ता और पंडित जी तो आए, लेकिन भक्तजनों में से कोई न आया। सुबह से शाम हो गई, लेकिन  कामना -प्राप्त भक्तों में से न किसी को आना था, न कोई आया।
फोन खटखटाए गए। सभी के घरों से तरह -तरह के बहाने...

सच्चे भक्त मायूस हो गए। इतना बड़ा धोखा ?

लेकिन संत जी ने हंस कर कहा :   

'छोड़ो, अब कोई नहीं आएगा। सभी के स्वार्थ पूरे हो गए। और आगे से अब कोई कामना पूरी होने वाली भी नहीं है। अब कोई क्यों आएगा ?'

लेकिन संत का खज़ाना कभी खाली नहीं होता। असली पूंजी तो अभी भी बाकी थी। उसे तो किसी ने मांगा ही नहीं था : आंतरिक सुख, शांति, संतोष, आरोग्य, शुचिता, भक्ति, आध्यात्मिक विकास। निश्चिंतता। भय से मुक्ति। सेवाभाव। और सबसे बढ़ कर महत्वपूर्ण : सत्संग !

ये सब किसे मिलेंगी ? उन सभी को  जो इस लोक और परलोक के सुख अपने अक्षय  पुण्यों के बल पर प्राप्त करेंगे।अधिकार के साथ। स्वाभिमान के साथ । अनंत काल तक ...

गुरु -लीला दर्शी